जिंदगी
*जिंदगी*
अकेला खड़ा हूँ,
ए जिंदगी मैं तुझसे कितना लड़ा हूँ,,,,
झटक कर बांह को जब छोड़ती थी!
किनारा कर खुदको जब मुंह मोड़ती थी!
तब बाद सीना ताने मैं फिर खड़ा हूँ!
अड़ा हूँ,
जिंदगी मैं तुझसे कितना लड़ा हूँ!
बिलखता था!,
बिखर कर, जब टूट जाता था,
गिरता था, सम्भल कर, जब चोट खाता था !
तुमने थाम कर मुझको वह मान दिया क्या?
मैं तुम पर मरूं वह जान दिया क्या ?
नसों में दौड़ते लहू का दाम दूँ क्या??
तुमने जिंदगी दी मैं प्राण दूँ क्या,??
शून्य से शिखर तक आकर खड़ा हूँ!
ए जिंदगी, देख तुझसे कितना बड़ा हूँ...
जलते हो हृदय में दाह रखते हो?
करुणा नहीं बस आह रखते हो?
जज्बात, इश्क,सजदा तुम क्या जानोगे..(2)
मैं तुम्हारा हूँ, तुम कैसे पहचानोगे??
कोई नहीं है!
देखो यहां कोई नही है!!
जो थे वो चले गए,
जो हैं वो भी चले जाएंगे,,,
मैं लड़ूंगा,,,
अकेला और खड़ा,
छूटे का साथी कौन??
हारे का साथी कौन??
जो जल रहा वह दीप है अकेला...
बाकी सब मौन (2)
: - मणिकांत पांडेय पथिक
चित्राभार -Google
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