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जिंदगी

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* जिंदगी *  अकेला खड़ा हूँ, ए जिंदगी मैं तुझसे कितना लड़ा हूँ,,,, झटक कर बांह को जब छोड़ती थी! किनारा कर खुदको जब मुंह मोड़ती थी! तब बाद सीना ताने मैं फिर खड़ा हूँ! अड़ा हूँ,  जिंदगी मैं तुझसे कितना लड़ा हूँ! बिलखता था!, बिखर कर, जब टूट जाता था, गिरता था, सम्भल कर, जब चोट खाता था ! तुमने थाम कर मुझको वह मान दिया क्या? मैं तुम पर मरूं वह जान दिया क्या ? नसों में दौड़ते लहू का दाम दूँ क्या?? तुमने जिंदगी दी मैं प्राण दूँ क्या,?? शून्य से शिखर तक आकर खड़ा हूँ! ए जिंदगी, देख तुझसे कितना बड़ा हूँ... जलते हो हृदय में दाह रखते हो? करुणा नहीं बस आह रखते हो? जज्बात, इश्क,सजदा तुम क्या जानोगे..(2) मैं तुम्हारा हूँ, तुम कैसे पहचानोगे?? कोई नहीं है!  देखो यहां कोई नही है!! जो थे वो चले गए, जो हैं वो भी चले जाएंगे,,, मैं लड़ूंगा,,, अकेला और खड़ा, छूटे का साथी कौन?? हारे का साथी कौन?? जो जल रहा वह दीप है अकेला... बाकी सब मौन (2) : - मणिकांत पांडेय पथिक चित्राभार -Google

सच, कितना सच है।

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सच, कितना सच है इतना या इतना या थोड़ा और ज्यादा नहीं नहीं सच उतना भी सच नहीं है जितना तुम समझते हो। सच दूर दिख रहे धूप में किसी जल की तरह है जब पास जाओ तो कुछ है ही नहीं। मृगतृष्णा की तरह यह भी झूठ है सच छल है छलावा है और झूठ भी है सच पूछो तो सच है ही नहीं। सच कभी था शबरी के बेर में विदुर के छिलके में शायद गोपियों के माखन में गोपियों के झूठ में भी जिसे हम तुम नहीं देख सकते ।

श्री सतुआ बाबा - परोपकार के आदर्श

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जीव जब जन्म लेता है तो, जन्म लेते ही उसके ऊपर कई प्रकार के ऋण अर्थात जिम्मेदारियां होती हैं, तथा इन्हीं जिम्मेदारियों का वहन करना उसका कर्तव्य होता है। हर इंसान समाज से कुछ न कुछ लेता है या, हम यूं कहें कि वह जो कुछ लेता है वह समाज से ही लेता है। इसलिए उसे समाज के लिए भी कुछ ना कुछ अवश्य करना चाहिए ताकि समाज एक दूसरे के साथ मिलकर निरंतर प्रगति कर सके। इसलिए यह प्रकृति का नियम है कि हमें समाज को कुछ ना कुछ देना होता है। अब यहां एक प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि क्या केवल मानव ही समाज से आदान-प्रदान करता है? इसका उत्तर है, नहीं ! धरती पर पलने वाले सभी जीव- जंतु प्रकृति के इस नियम का सुंदर पालन करते हैं। परंतु समाज में कुछ अपवाद भी हैं, अर्थात कुछ लोग ऐसे भी हैं समाज से बहुत कुछ बहुत कुछ लेना तो चाहते हैं पर देना नहीं चाहते और समाज को क्षति भी पहुंचाते हैं, पर इसी समाज में कुछ विभूति ऐसे भी हैं जो केवल समाज, मानवता और उसकी भलाई के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। इन्हीं विभूतियों में से एक हैं अप्रतिम एवं अनन्य प्रातः स्मरणीय श्री सतुआ बाबा एवं सतुआ बाबा आश्रम । ...

वर्षा - जीवन का दूसरा नाम

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"वर्षा”   कितना प्यारा, नाम तुम्हारा नाम से प्यारा, काम तुम्हारा वृष अच् टाप् से बनी हो तुम आशाओं से सजी हो तुम तुम से ही है, धरा ये अंबर,। सूरज चंदा और समंदर , तुम से ही है देश की शान राजा रंक और किसान ।। तुम नही आती तो मैं न आता, धरती मां को कौन सजाता, माता बहनें रह न पाती, मुनिया बेटी भूखी सो जाती। तुम बिन रहना गवारा नहीं, हमने तुम्हें बिसराया नहीं तुम भूल कभी हमें जाना नहीं मैं तुमसे हूं तुमने पहचाना नहीं।। हे ! वर्षा क्या तुम्हें ध्यान है? तुम न आई हम परेशान हैं एक बात तुम ध्यान ये रखना ऐसी कभी तुम भूल न करना तुम हो जीवन देने वाली  करती हो सबकी रखवाली तुमसे ही मुझमें जान है  मेरे शब्दों में भी प्राण है “मणि” देता है संदेश यहां पर, कोई प्यासा न रहे धरा पर, इसलिए बूंद - बूंद बचाओ भैया कहीं प्यासी है गैय्या मैय्या ॥ - मणिकांत पाण्डेय " वैरागी" चित्राभार - गूगल

सोचता हूँ... लौट आ माँ....!!!

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"लौट आ मां " सोचता हूँ... लौट आ माँ.... ढूंढता हूँ अब तुझे में.... रात की गहराइयों में.... मौत की परछाइयों में ..... दर्द की तन्हाइयों में...... डर लगता ये बसेरा..... सोचता हूँ, लौट आ माँ.... ढूंढता हूँ अब तुझे में .........!!!                                       चीखता है ये अँधेरा.... कौंधता है जग ये सारा.... फिर से कोई कर इशारा.... सोचता हूँ, लौट आ  माँ..... ढूंढता हूँ अब तुझे में.......!!!                                              सूना है समसान सारा.... घर आंगन द्वार तेरा.... फिर से कोई हो सवेरा.... देखता हूँ रूप तेरा...... सोचता हूँ, लौट आ माँ..... ढूंढता हूँ अब तुझे में.....!!!          हर घड़ी रुसवाई.... मौत की परछाई.... काल कवलित हो रहा हूँ.... खुद  से  खुद को खो रहा हूँ.... रक्तरंजित पाँव है...           ...

मैं बिहार हूँ!

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    मैं धूल हूँ, मैं राख हूँ    मैं दल दल का खाक हूँ       मैं दर दर भटकता     एक अभिशाप हूँ    !   मैं बिहार हूँ                                                                                                                                 रोटियों की बोटियां खरोचती कसौटियाँ बचपन में पचपन की भार ढोती बेटियाँ                                                     तूफानों से निकलता एक शैलाब  हूँ मैं बिहार हूँ!                 ...

बेटी हूँ ना !

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मैं रोऊँगी नहीं मैं पूछूँगी भी नहीं बेटी हूँ न!   हो सकता है ! मै उन्हें बोझ लगती हूँ, मेरे लिये प्यार बचा ही न हो ! शायद, एक ही खिलौना बचा था, 'पुष्प' के लिये ले आये क्यों ? पूछूँगी नही रोऊँगी भी नही बेटी हूँ न ! शैतानी 'पुष्प' करता हो, और डांट मुझे पड़े! 'पुष्प' सोता रहे! मैं काम करूँ मेरे लिये जली रोटियाँ ही बचे!  क्यों ? मैं पूछूँगी नहीं मैं रोऊँगी भी नहीं बेटी हूँ न ! बेटी पराई होती है उसे अपना घर जाना है वो वहाँ की नूर होती है ऐसा माँ कहती है क्यों ? मैं पूछूँगी नहीं मैं रोऊँगी भी नहीं बेटी हूँ न ! मुझे पता है एक दिन मैं किसी और को सौंपी जाऊँगी! वह अंजाना होगा बेगाना होगा परवाना होगा हाय ! मेरा जीवन कैसा होगा ! क्या मुझे भी अग्निपरीक्षा देनी होगी ? क्या मुझे भी आग के हवाले किया जायेगा? क्यों ? मैं पूछूँगी नहीं! मैं रोऊँगी भी नहीं ! बेटी हूँ न !                                                        माँ..... मैं रोऊँगी  खूब र...